
हिंदी की अद्यापिका को समर्पित
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कल सुबह बैठा मैं छत पर,
कर रहा था प्रकृति का पान
सोचा था एक कविता लिखूंगा
परन्तु हो गयी सुबह से शाम |
प्रकृति से बातें की थी मैंने
प्रकृति भी बोल उठी -
"आओ बालक तुम्हे बतलाऊंगी मैं आज सब
क्या-क्या बीती मुझ पर - कल से आज तक" ||
फिर प्रकृति शुरू हो गयी, सहित अपने होशो हवास
मैं भी उसमे डूब गया, अपने हाथ पाँव पसार |
प्रकृति बोली -
" यह बातें हैं भूत काल की, जब शुरू हुआ ब्रम्हांड,
अरे ! मनुष्य तो बाद में आया, पहले से थी मैं विद्यमान |
मैंने ही जन्म दिया मनुष्य को, सोचा था होगा एक सपना साकार,
बेटा समझा था मैंने उसको, सोचा था माँ समझेगा वह मुझको ||
फल-फूल समर्पित, अपनी गोद समर्पित, जीवन समर्पित
कर दिया सर्वस्य दान,
ज्ञात ना था कि, यह दिन देखना पड़ेगा
क्योकि मैं भी तो थी तब नादाँ ||
प्यास बुझाई, भूख मिटाई, जीने कि एक राह दिखलाई
किया था दिल से उस पर भरोसा
परन्तु छि:! दिया उसने मुझको ही धोका |
सिर से धड को अलग कर डाला
पशु पंछियों का घर तोड़ डाला
माँ के माथे का सिन्दूर पोंछ डाला
मेरी नादानी का मजाक बना डाला ||
परन्तु पछतावे कि आग में जल रहा है वह आज
जाओ! माँ का दिल है ना, क्षमा करती हूँ
इसीलिए तुम्हे एक सूक्ति देती हूँ -
हे बालक! करो प्रण अपने ह्रदय से आज
कि प्रकृति माँ की लालिमा वापस लायेंगे हम
और ऐसा करने को जान पर खेल जायेंगे हम |
तभी- जाग गया मैं, आखें खुल गयी,
हाँ! प्रकृति माँ ने आँखें खोल दी थी मेरी |
सोचने लगा क्या किस्मत है मेरी,
और इसी के साथ कविता पूर्ण हुई यह मेरी” ||
Creation: 2002 © Nishit Shankar
I believe in God, only I spell it Nature.
- Frank Lloyd Wright
lovely ! read a hindi poem after a long time...
ReplyDeletevery good sir
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