Thursday, January 14, 2010

| हाय! मेरे यह बुझते दीप... |

जब भी मैं भ्रमण करने निकलू
उत्तर, दक्षिण, पूरव, पशचिम
चहुँ दिशा वही दृष्य पड़ जाए दीख
और फिर मुख से निकले - हाय! मेरे यह बुझते दीप...

इन दीपों ने प्रकाश फैलाना नहीं
अंधकार में ही बुझ जाना सीखा है,
इन नन्हे धड़कते दिलों ने हँसाना-खेलना नहीं
बस भीख मांगना ही सीखा है |

यह धरती वही, जिसकी मिट्टी ने नवाबों का फ़साना देखा है
कलयुग की इन हवाओं ने सतयुग का ज़माना भी देखा है |

पर दोषी कौन आओ इस पर विचारें,
वही हैं हम, इस सत्य को ना नकारे |

जरुरत है हमें अब, "क, ख, ग, घ..." साक्षरता अभियान चलाने की
ज्ञान के उजाले से अज्ञानता के अंधकार को मिटाने की,

निराश चेहरों पर आशा की किरण जगाने की.....

तभी बुझे दीप जलेंगे, एक दूजे से दिल भी मिलेंगे
तब नहीं पड़ेंगे मुझे ऐसे दृष्य दीख
ना मुख कहेंगे, हाय! मेरे यह बुझते दीप...

Creation 2002 © Nishit

Walking past the beggar and the suffering, a man asks, “ Why oh God, do you not do something for these people?” To which God replied, ‘ I did do something, I made you...’

2 comments:

  1. Hey you write nice hindi, well i wish you all the best for your future. Keep writing.
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